भारतीय बैंकिंग विकास में वित्तीय समावेशन की भूमिका : एक संक्षिप्त अध्ययन

Authors

  • डॉ. हर्षना सोनकुसरे Author

DOI:

https://doi.org/10.64751/p8w82g62

Abstract

दूसरे विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद तेजी से औद्योगिक प्रगति करने की भावना प्रबल हो गई। इसके साथ ही, आधुनिकीकरण और पुरानी मशीनरी के प्रतिस्थापन की भी सख्त जरूरत थी। उस समय बडे पैमाने के उद्योगों को वित्त दिलाने के लिए जो एजन्सियाँ उपलब्ध थीं, वे या तो इस सम्बन्ध में उदासीन थीं या अपर्याप्त मानी जाती थीं। अतः भारत सरकार ने बडे़ पैमाने के उद्योगों को धन-राशि उपलब्ध कराने के लिए बहुत से वित्तीय संस्थान कायम किए।

समावेशनकी उपर्युक्त अवधारणा इस बात की ओर इंगीत करती है कि देश के हर नागरिक का आर्थिक और सामाजिक स्तर ऐसा हो कि वह विकास में सहभागी हो सके। यह स्थिति तभी सकती है जब देश का हर नागरिक शिक्षित हो, स्वस्थ हो, सामाजिक रूप से पिछड़ा और उपेक्षित हो तथा उसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ-साथ आर्थिक स्वतंत्रता भी प्राप्त हो। सामाजिक और आर्थिक विकास के हर पहूल से उसका जुड़ाव हो तथा वित्तीय समावेशन एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके तहत पूरे विश्व के लोग मिलकर एक ऐसे समाज की रचना करे जिसके तहत व्यापार, विदेशी प्रत्यक्ष निवेश, पूंजी प्रवाह और प्रौद्योगिकी प्रसार के माध्यम से आर्थिक, तकनीकी, सामाजिक और राजनीतिक ताकतो का संयोजन करके राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था का अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्थाओं में एकीकरण कर सके। इस वित्तीय समावेशन की प्रक्रिया में भारत की भी अनेंक आर्थिक योजनाओं का समावेश है। प्रस्तुत लेख में भारत सरकार कि एक योजनावित्तीय समावेशनका विवेचन हम करने वाले है। इस अध्ययन का मुख्य उद्देश्य वित्तीय समावेशन के वैश्विक परिदृश्य को जानना और क्या यह योजना पूर्ण रूप से कार्यान्वित हुई की नहीं साथ ही वित्तीय समावेशन के अवसरों और चुनोतियों का पता लगाना है अर्थात जागतिकरण में वित्तीय समावेशन योजना का क्या प्रारूप है और जागतिकरण में इस योजना क्या योगदान है इसका अध्ययन करना हमारा उद्देश्य है।

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Published

2026-04-16

How to Cite

डॉ. हर्षना सोनकुसरे. (2026). भारतीय बैंकिंग विकास में वित्तीय समावेशन की भूमिका : एक संक्षिप्त अध्ययन. International Journal of Economic Social Science and Management LAW, 7(1(1), 879-888. https://doi.org/10.64751/p8w82g62