प्रेमचन्द के उपन्यास में नीहित समस्याएँ
DOI:
https://doi.org/10.64751/tm1w0r93Abstract
मुंशी प्रेमचन्द हिन्दी एवं उर्दू के लेखक के रूप में पहचाने जाते हैं, उनका जन्म ३१ जूलाई १९८० में वारासणी के निकट लमही नामक गाँव में हुआ था। उनका जीवन काफी संघर्षमय रहा। उन्होंने कहानी एवं उपन्यास दोनों विद्याओं में साधिकार लिखा है। उन्होंने यथार्थवादी चित्रण ही पेश किया है। मुझे यहाँ प्रेमचन्द के समस्यामूलक उपन्यासों को ही उजागर करना है, इसीलिए सीधे ही इस विषय की ओर जा रहे हूँ और उनके महत्त्वपूर्ण उपन्यासों में कौन समस्याएँ हैं और कैसी समस्या को लेकर पूरा उपन्यास लिखा गया, इन्हीं बातों के साथ चर्चा होगी ।
साहित्य समाज का दर्पण है और साहित्यकार एक ऐसा प्रकाश पुंज है, जो भ्रान्ति- तिमिर को चीरकर स्पष्ट दिशा का निर्देश करता है। इस शताब्दी के आरम्भ में हिन्दी साहित्य को एक ऐसा साहित्यकार मिला जिसने शोषित और पाड़ितों के अन्तर में कुलबुलाती भावनाओं को वाणी दी तथा अपने साहित्य के माध्यम से सामाजिक कुरीतियों और शोषण के विरूद्ध एक ऐसा आन्दोलन छेड़ा जो आज भी हमारे समाज की सबसे बड़ी आवश्यकता है। वह साहित्यकार थे, कथा-सम्राट मुंर्श प्रेमचन्द ।
मुंशी प्रेमचन्द का साहित्य आज भी उतना ही सामयिक, प्रासंगिक तथा सटीक है, जितना उनके जीवन-काल में था, बल्कि ऐसा लगता है, वह आज भी हमारी राष्ट्रीय समस्याओं का एक सच्चा दर्पण है।
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